राम की परछाई: एक कस्बे का असली दशहरा

राम की परछाई : एक छोटे कस्बे का असली दशहरा




प्रस्तावना : कस्बे का उत्सव

अक्टूबर की हल्की ठंडी शाम थी। कस्बे के मैदान में हज़ारों लोग जमा थे। पूरा इलाका रंग-बिरंगी झालरों और बिजली की रोशनी से जगमगा रहा था।
ढोल-नगाड़ों की आवाज़ और भजनों की धुन पर बच्चे नाच रहे थे। महिलाएँ नए कपड़ों में सजकर मेले में घूम रही थीं।
आज दशहरा था, और हर साल की तरह यहाँ भव्य रामलीला का आयोजन हुआ था।

कस्बे का सबसे चर्चित युवक सत्यम इस बार राम की भूमिका निभा रहा था।
लोग कहते थे कि उसका चेहरा, उसकी आवाज़ और उसका आत्मविश्वास सचमुच किसी अवतार की तरह लगता है।
दूसरी तरफ़ रावण की भूमिका निभा रहा था भानु ठाकुर – कस्बे का दबंग, अमीर और घमंडी आदमी, जिसका असली स्वभाव भी किसी रावण से कम नहीं था।


पहला दृश्य : मंच और परछाई

रामलीला का मंच सज चुका था।
राम और रावण आमने-सामने थे।
भीड़ साँस रोके देख रही थी।

इसी बीच अचानक मंच के पीछे की सफ़ेद दीवार पर एक अजीब सी छाया उभर आई।
वह छाया किसी देवता जैसी लग रही थी।
लोग फुसफुसाने लगे – “राम खुद आ गए हैं!”
कुछ ने तो हाथ जोड़ लिए।

दीवार पर लिखे शब्द उभर आए —
“सच्चा रावण मंच पर नहीं, तुम्हारे बीच खड़ा है।”

भीड़ में सन्नाटा छा गया।
सबकी नजरें भानु ठाकुर की तरफ़ घूम गईं।


कस्बे में बंटता विश्वास

भानु ने ठहाका लगाया और बोला –
“अरे यह सब धोखा है! किसी ने जानबूझकर लिखा होगा। असली रामलीला तो मैं करा रहा हूँ, और वही चलेगी।”

उसके समर्थक तालियाँ बजाने लगे।
लेकिन बहुत से लोग बुदबुदा रहे थे – “बात में सच्चाई है।”
कुछ जवान लड़के चिल्लाए – “अब असली रावण को पहचानो!”

भीड़ दो हिस्सों में बँट गई।
मेला मानो रणभूमि में बदल रहा था।


सत्यम का पारिवारिक सच

मंच पर खड़ा सत्यम बेचैन था।
उसे अचानक अपने पिता की पुरानी बातें याद आ गईं।

सालों पहले जब परिवार कर्ज़ में डूबा था, तो उसके पिता ने आधी ज़मीन भानु ठाकुर को बेच दी थी।
लोग कहते थे कि यह मजबूरी नहीं, बल्कि जबरन दबाव था।
सत्यम के मन में टीस उठी –
"क्या मैं राम की भूमिका निभाने लायक हूँ?
जब मेरे अपने पिता रावण के सामने झुक गए थे?"

उसकी आवाज़ भर्रा गई।
लेकिन तभी उसकी नजर फिर दीवार पर गई —
“सच्चा रावण तुम्हारे बीच खड़ा है।”
मानो वे शब्द उसे हिम्मत दे रहे थे।


भीड़ का टकराव

मैदान में हंगामा बढ़ गया।
कुछ लोग ठाकुर की जय बोल रहे थे।
दूसरे लोग नारे लगा रहे थे – “अत्याचार बंद करो!”
बच्चे रोने लगे, औरतें घबरा गईं।

रामलीला समिति के लोग घबराकर माइक बंद करना चाहते थे।
लेकिन सत्यम ने हाथ उठाकर रोका।
वह आगे बढ़ा और बोला –

“भाइयों-बहनों, आज दशहरा है।
आज हमें असली रावण का नाम लेना होगा।
अगर हम डरते रहे, तो यह रामलीला सिर्फ़ एक नाटक रह जाएगी।”


परछाई का रहस्य

इतने में भीड़ से एक बुजुर्ग महिला आगे आईं।
सबने उन्हें पहचान लिया — यह थीं गुलाबो काकी
वो औरत, जिसने सालों पहले ठाकुर के दबाव में अपना खेत और घर खो दिया था, और अब झोपड़ी में रहती थीं।

काँपती आवाज़ में उन्होंने कहा –
“ये परछाई किसी देवता की नहीं, हमारी पीड़ा की है।
मैंने ही कोयले से यह वाक्य लिखा था।
क्योंकि मैं चाहती थी कि आज दशहरे के दिन लोग असली रावण को पहचानें।”

भीड़ सन्न रह गई।
एक साधारण औरत ने सच्चाई उजागर कर दी थी।


निर्णायक मोड़

सत्यम ने आगे कहा –
“गुलाबो काकी सही कह रही हैं।
आज अगर हम चुप रहे, तो हमारे बच्चों को भी यही अत्याचार झेलना पड़ेगा।
राम की परछाई कोई चमत्कार नहीं, यह हमारी हिम्मत है।
आइए, हम सब मिलकर अपने भीतर के डर को जलाएँ।”

भीड़ अब गुस्से में थी।
लोगों ने ठाकुर के खिलाफ नारे लगाने शुरू कर दिए।
पहली बार कस्बे के नेता और अधिकारी भी चुपचाप पीछे हट गए।


रावण दहन

सत्यम ने धनुष उठाया।
उसने भीड़ की ओर देखकर कहा –
“यह बाण सिर्फ़ पुतले को नहीं, बल्कि हमारे भीतर के रावण को भी जलाएगा।”

धनुष से छोड़ा गया तीर पुतले से जा टकराया।
पुतला धू-धू कर जल उठा।
लेकिन इस बार किसी की निगाह पुतले पर नहीं थी।
सबकी निगाह भानु ठाकुर पर थी।
लोगों को लग रहा था कि असली रावण का दहन आज हो चुका है।


अंत : कस्बे की नई शुरुआत

आग की लपटों में रोशनी और शोर गूँज उठा।
लेकिन उस शोर में एक नई आशा भी थी।
लोग पहली बार महसूस कर रहे थे कि दशहरा सिर्फ़ परंपरा नहीं, बल्कि आत्ममंथन का पर्व है।

सत्यम के चेहरे पर सुकून था।
गुलाबो काकी की आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन वह मुस्कुरा रही थीं।

कस्बे के लोग समझ गए थे कि असली परछाई राम की नहीं, बल्कि उनकी अपनी अंतरात्मा की थी —
जो उन्हें साहस और सच्चाई दिखा रही थी।

उस रात दशहरा सिर्फ़ पुतले का नहीं, बल्कि एक नई सोच का उत्सव बन गया।



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