🌿 वो एक अल्प-ज्ञात गाँव जहाँ समय रुक गया हो
रेल की पटरी का अंतिम छोर… जहाँ पटरियाँ अचानक मिट्टी में समा जाती हैं और इंजन की सीटी भी थककर धीरे-धीरे हवा में खो जाती है।
उस छोर के बाद शुरू होता है एक संकरा कच्चा रास्ता—और उस रास्ते के अंत में बसा है एक रहस्यमयी गाँव: देवपुर।
नक्शों में इसका कोई नाम नहीं, गूगल मैप्स पर भी इसका कोई निशान नहीं।
कहा जाता है, जो भी गलती से देवपुर पहुँचता है, उसका जीवन कभी पहले जैसा नहीं रहता।
🕰️ घड़ी की जमी हुई सुई
देवपुर में घड़ियाँ काम नहीं करतीं। चौपाल पर लगी पुरानी पीतल की घड़ी ग्यारह बजकर पाँच मिनट पर अटकी है।
गाँव वालों की कलाई-घड़ियाँ भी वही समय दिखाती हैं। यहाँ तक कि किसी का मोबाइल भी देवपुर की सीमा में आते ही उसी समय पर रुक जाता है।
बच्चों के चेहरे सालों से वैसे ही मासूम हैं।
जवानों की आँखों में वही चमक है, बिना उम्र ढले। और बुज़ुर्ग—वे न और बूढ़े होते हैं, न और जवान।
देवपुर में समय सचमुच रुक गया है।
🚶 अजनबी की दस्तक
एक दिन, शहर से आया युवक अर्जुन वहाँ पहुँचा।
शहर के कोलाहल से ऊबा हुआ, वह शांति की तलाश में निकला था।
देवपुर की हरियाली, बैलों की घंटियाँ और मिट्टी की महक उसे पहली ही नज़र में भा गईं।
पहले-पहले तो उसे यह जगह जादुई लगी।
कोई शोर नहीं, कोई भागमभाग नहीं।
हर चेहरा मुस्कुराता हुआ, हर आँगन में गीत।
लेकिन कुछ ही दिनों में उसने महसूस किया कि इस गाँव में न कोई जन्म ले रहा है, न कोई मर रहा है।
सब कुछ वैसा ही है—जैसा था।
🌊 सूखी नदी का रहस्य
गाँव की सीमा से बाहर निकलते ही अर्जुन ने एक सूखी नदी देखी।
चौड़ी और गहरी धारा, पर उसमें सिर्फ़ दरारों भरी रेत थी।
गाँव के बुज़ुर्ग ने धीमी आवाज़ में कहा:
“बेटा, यही हमारी किस्मत की धारा थी।
जिस दिन यह सूखी, उसी दिन समय भी थम गया।”
लोग बताते थे कि कई पीढ़ियों पहले, नदी किनारे शिवलिंग की पूजा बंद हो गई थी।
उस दिन नदी का प्रवाह रुक गया और देवपुर का समय भी उसी पल कैद हो गया।
🌙 सपनों की औरत
एक रात अर्जुन ने सपना देखा।
सपने में एक वृद्धा आई, सफेद साड़ी में, आँखों में अजीब-सी चमक।
उसने कहा:
“समय से भाग मत, उसे अपनाओ।
नदी को जगाओ… तभी देवपुर जागेगा।”
अर्जुन नींद से हड़बड़ा कर उठा।
वह जानता था—अब उसे कुछ करना होगा।
🔥 अर्जुन का प्रयत्न
सुबह वह नदी किनारे गया।
वहाँ की मिट्टी खोदते-खोदते उसे पुराना शिवलिंग मिला, धूल और काई में ढका हुआ।
वह काँपते हाथों से उसे साफ़ करने लगा।
गाँव के कुछ लोग भी उसके साथ जुड़ गए।
और बरसों बाद पहली बार वहाँ दीपक जला।
अर्जुन ने प्रार्थना की, और पूरा गाँव उसके साथ गाने लगा।
🌊 समय का बहाव लौट आया
दीपक की लौ हवा में डगमगाई और अचानक नदी की रेत से पानी रिसने लगा।
फिर जैसे किसी ने बाँध तोड़ दिया हो—लहरें उमड़ पड़ीं।
गाँव में गूँज उठी सीटी—घड़ी की सुइयाँ ग्यारह बजकर छः मिनट पर आगे बढ़ गई थीं!
उस पल गाँव बदल गया।
बच्चे बढ़ने लगे, उनके कपड़े छोटे पड़ने लगे।
जवानों की आँखों के कोनों पर झुर्रियाँ उभर आईं।
बुज़ुर्गों की पीठ और झुक गई।
देवपुर, जो बरसों से कैद था, फिर से जीवन की धारा में बह चला।
🌸 अर्जुन की विदाई
गाँव के लोग अर्जुन के पैरों में गिर पड़े।
“तुमने हमें नया जीवन दिया,” उन्होंने कहा।
अर्जुन मुस्कुराया।
उसे समझ आ चुका था—जीवन की असली सुंदरता रुकने में नहीं, बल्कि बहने में है।
अगर समय रुक जाए तो सपने भी अधूरे रह जाते हैं।
वह अपने शहर लौट गया, पर जाते-जाते उसने देवपुर की मिट्टी अपने साथ ले ली—याद के तौर पर।
✨ कहानी की सीख
देवपुर हमें यही सिखाता है—
👉 समय को रोकने की नहीं, जीने की ज़रूरत है।
हर पल को जियो, क्योंकि बहते पानी की तरह समय ही जीवन को अर्थ देता है।

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